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जापान के निहोन हिदांक्यो संगठन को नोबेल पीस प्राइज:​​​​​​​दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की कोशिश के लिए मिला सम्मान

जापान के संगठन निहोन हिदांक्यो को इस साल शांति के लिए नोबेल प्राइज से नवाजा गया है। उन्हें यह सम्मान दुनिया में परमाणु हथियारों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए दिया गया है। इस संगठन में वे लोग शामिल हैं जो दूसरे विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले में जीवित बचे थे। इन्हें हिबाकुशा कहा जाता है।

ये हिबाकुशा दुनिया भर में अपनी पीड़ा और दर्दनाक यादों को निहोन हिदांक्यो संगठन के जरिए साझा करते हैं। नोबेल कमेटी ने कहा कि एक दिन परमाणु हमले को झेलने वाले ये लोग हमारे पास नहीं रहेंगे, लेकिन जापान की नई पीढ़ी उनकी याद और अनुभवों को दुनिया के साथ साझा करती रहेगी और उन्हें याद दिलाती रहेगी कि परमाणु हथियार दुनिया के लिए कितने खतरनाक हैं।

6 अगस्त 1945 को गिराए गए परमाणु बम के केंद्र के सबसे करीब हिरोशिमा की चैंबर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स इमारत थी। हमले के बाद इसे घटना की याद के रूप में बिना मरम्मत के छोड़ दिया गया था।
6 अगस्त 1945 को गिराए गए परमाणु बम के केंद्र के सबसे करीब हिरोशिमा की चैंबर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स इमारत थी। हमले के बाद इसे घटना की याद के रूप में बिना मरम्मत के छोड़ दिया गया था।

6 अगस्त 1945 को 8 बजकर 15 मिनट पर अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर एलोना गे विमान से परमाणु बम गिराया था। 43 सेकेंड हवा में रहने के बाद ये फट गया था। इसके तुरंतबाद एक बड़ा आग का गोला उठा था और आसपास का तापमान 3000 से 4000 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था।

विस्फोट से इतनी तेज हवा चली कि 10 सेकेंड में ही ये ब्लास्ट पूरे हिरोशिमा में फैल गया था। धमाके के चंद मिनट के अंदर ही 70 हजार लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले के 3 दिन बाद अमेरिका ने नागासाकी पर भी परमाणु बम गिराया था। इस बम को फैट मैन नाम दिया गया था। वहीं हिरोशिमा पर गिरे बम का नाम लिटिल बॉय था।

4500 किलो वजनी फैट मैन 6.5 किलो प्लूटोनियम से भरा हुआ था। नागासाकी में बम करीब 11:02 बजे फटा था। इस हमले में 40 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। न्यूक्लियर हमले के बाद जापान ने समर्पण कर दिया था और दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो गया था।

2023 में ईरान की महिला पत्रकार और एक्टिविस्ट नरगिस मोहम्मदी को नोबेल पीस प्राइज से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह प्राइज महिलाओं की आजादी और उनके हक के लिए लड़ने पर मिला था। नोबेल कमेटी ने पीस प्राइज की घोषणा ईरान की महिलाओं के नारे जन-जिंदगी-आजादी के साथ की थी।

51 साल की नरगिस ईरान की एवान जेल में कैद हैं। उन्हें अब तक 13 बार गिरफ्तार किया जा चुका है। आखिरी गिरफ्तारी के बाद नरगिस को 31 साल की जेल और 154 कोड़ों की सजा सुनाई गई थी।

जून 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में नरगिस ने कहा था कि उन्होंने 8 साल से अपने बच्चों को नहीं देखा है। उन्होंने आखिरी बार अपनी जुड़वा बेटियों अली और कियाना की आवाज 2022 में सुनी थी।

तस्वीर में नोबेल प्राइज विजेता नरगिस मोहम्मदी अपनी 2 जुड़वा बेटियों अली और कियाना के साथ नजर आ रही हैं।
तस्वीर में नोबेल प्राइज विजेता नरगिस मोहम्मदी अपनी 2 जुड़वा बेटियों अली और कियाना के साथ नजर आ रही हैं।

नोबेल पीस प्राइज की शुरुआत 1901 में हुई थी। अब तक यह सम्मान 112 लोग और 30 संस्थाओं को मिला है। महात्मा गांधी को 5 बार नॉमिनेट किए जाने के बाद भी नोबेल पीस प्राइज नहीं दिया गया। इस पर कई बार सवाल उठ चुके हैं।

1937 में नोबेल प्राइज कमेटी के एडवाइजर रहे जेकब वॉर्म-मुलर ने कहा था

गांधी एक स्वतंत्रता सेनानी, आदर्शवादी, राष्ट्रवादी और तानाशाह हैं। वो कभी एक मसीहा लगते हैं, लेकिन फिर अचानक एक आम नेता बन जाते हैं। वो हमेशा शांति के पक्ष लेने वालों में नहीं रहे। उन्हें पता होना चाहिए था कि अंग्रेजों के खिलाफ उनके कुछ अहिंसक अभियान हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे।

जेकब की इस रिपोर्ट के बाद कमेटी ने महात्मा गांधी को शांति के लिए नोबेल प्राइज नहीं देने का फैसला किया। ये इकलौता मौका नहीं था, इसके बाद भी 4 बार 1938, 1939, 1947 और 1948 में गांधी को नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया गया था। हालांकि, हर बार उनका नाम हटा दिया गया।

1939 के 8 साल बाद जब देश आजाद हुआ तो एक बार फिर गांधी को नोबेल देने की मांग उठी। 1947 में गांधी को 3 लोगों ने मिलकर फिर से नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया। उस नोबेल प्राइज कमेटी ने इस सम्मान के लिए 6 लोगों को शॉर्टलिस्ट किया था, जिसमें गांधी का भी नाम था।

हालांकि, उस वक्त नोबेल कमेटी के एडवाइजर रहे जेन्स आरुप सेइप की रिपोर्ट में गांधी की सराहना थी, लेकिन उन्हें पूरी तरह से इस सम्मान का हकदार नहीं बताया गया। इसकी एक बड़ी वजह थी भारत-पाकिस्तान विभाजन।

नोबेल कमेटी में मौजूद 5 में से 3 मेंबर इस बात के पक्ष में थे कि बंटवारे और दंगों के बीच गांधी को यह अवॉर्ड नहीं दिया जा सकता। विभाजन के वक्त देशभर में घूम-घूम कर दंगे रोकने की अपील कर रहे गांधी एक बार फिर नोबेल से चूक गए। 1947 का नोबेल प्राइज क्वेकर संस्था को दिया गया।

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